#‎सफर_ए_वाल्वो‬ #ankushThakur
HRTC की वसो मे तो वैसे हर हिमाचली ने सफर किया होगा डैफिनेटली किया ही होगा , हमारे पहाडों मे यातायात के लिये यह रीढ की हड्डी का काम करती है , लेकिन प्रदेश के साथ दूसरे राज्यो को जोडने के लिये खास वसें भी निगम के पास है जिनमे वोल्वो डिल्कस शामिल है, ईन वसों की खासियत है कि यह काफी वडी ,साफ सुथरी गर्मियो मे ठण्डी और शर्दीयो मे गर्म रहती है , वाकी तमाम दूसरी सुविधाए अलग से होती है, तो जी हम जव भी हरी हरी वडी वडी वसों को देखते थे तो दिल कर जाता था कि ईसमे भी जाकर देखेंगे पर कभी टाईमिंग की समस्या तो कभी जल्दबाजी मे हम ईसमे सफर कर नही पाते थे पर जैसे तैसे कुछ साल पहले हमने ठान ली की जायेगे तो वोल्वो मे ,भला कौन आर्डीनरी वसों की खिड़कीयों को भरी ठण्ड मे आगे धकेलता रहे ,कौन अखवार लगाकर खिडकी वंद करने की नाकाम कोशिश करता रहे , नहीं विल्कुल नही ईस वार तो हरगिज नहीं , और लो जी वोल्वो का टिकट खटक, किराये के डिजीट भले ही, थोडे पहली वाली टिकट के डिजीट से ज्यादा थे पर अरमान ईच्छाओ मे ईंसान हर डिजीट को भूल जाता है , सो हम भी भूल लिये ,जनाव वक्त से पहले पहुंचकर एक दम स्पैसल वाली फील ले रहे थे ,कुछ ही देर मे यात्रीयो का जमावडा शुरु हो गया , कुरकुरे ,लेज के वडे वडे फलाफे पकड कर कुछ लोग कति वलैती वाली फील करा रहे थे ,थोडी देर के लिये तो मानो हम सकते मे आ गये कि हैं तो हमीरपुर मे ही कि कहीं दूसरे राज्य मे तो नही पहुंच गये ,खैर अपनी अपनी सीट पर वैठ कर हम थोडा रिलैक्स से होने लगे तभी वस के अंदर की आवाजें फिर मुझे सोचने पर मजवुर करने लगी ,कोई पहाडी वोले ही ना , ईवन दादी भी वेटा प्रताप विहार मे वहुत मिल जायेगी करके अपने पोते से हिंदी मे वोले , मै सोचने लगा कि मै ही अकेला पहाडी स्पीसीज हूं यहाे पर या दूसरे भी हैं मेरी वाली स्पीशीज के ? ?? मेरी सीट खाली थी मैने एक दादू जो भीड मे थोडे कम्फरटेवल से फील नही कर रहे थे सो मैने कहा दादा जी एत्थी वैठी जाओआ , दादू जी तो कती हायव्रिड शहरी निकले वोले ,हमारा समाण पडा है उपर ईसे भी देखणा पौणा है ,उपर से वच्चे यह वडा रौला पाते है , आप ईसे, पांकू (शायद पोता होगा की तरफ ईशारा करते हुये)को वठाई लो अपणे पास ,हम तो एडजस्ट करी लैन्दे , दादू की मिक्स हिंदी पहाडी मेरा खूव मनोरंजन कर रही थी , दादी के साथ वतियाते हुये दादू , अरे वो दराटी लेकर गयी थी मैने ही कहा था वौंकरी वनानी है तो घास के पुले काट लाना , 😝😄😜 वैसे हिंदी की गटर पटर मे मैं भी वहुत जुल्म ढा देता था पर घर जाकर थोडा देशी वाली फिल चेंज कर देती थी सव , वस दूरिया मिटाकर सफर तय करती गयी ,वस मे अव सव शांत थे ना कोई रौला 😝😜 ना वाहर का शोर उपर से वस के अंदर का मौसम भी सुहावना , यह भी महसूस नही हो रहा था कि वस मे जा रहे सा प्लेन मे , एसे चलते चलते चण्डीगढ़ के पास आ पहुंचे ,अव चण्डीगढ़ के पास हमारी वस के ड्राईवर को कया हुआ कया नही रव जाने सिधा पार्क मे चढा दी , पहाड पर नीचे उपर चढा कर मैदानी ईलाके मे शायद वन्दे को मजा नही आ रहा होगा हाहा , और लो जी एक सैकण्ड मे सवकी चिखें एक जैसी आवाजे सुनने लगी ,एसा लगा फिरसे हिमाचल पहुंच गया ,चिखें ईस प्रकार थी , ओलै , ओईवो , हाये वो मेरीये माउ, उई मम्मी (कालेज दी कुडी थी ) कन्नै ईक वोलणे लगेया तेरीया माउ दा खसम मारेया कुतियो चलाईदी ए मा अपणी , हाहाहा मै चुपचाप सवको सुनकर देखकर हंस रहा था , दो मिनट मे सवको पूरी पहाडी याद आ गयी थी, दो मिनट मे सव एसे लग रहा था हिमाचल मे वापिस आ गये , वगल मे वैठा दादू वहि जो हायव्रिड हिंदी वोल रहा था तपाक से वोल पडा , मुन्नु ' कुट 'तानी लाईदा , वच्चा तु असांदे दिहां सियाणके वेल्ले हड्डां पनांदां अरा ,कुसी नी पालने मंजे पर नैता , और वस मे जोरदार ठहाका ॥ हाहाहाहा
वोल्वो का एक्सपिरींयस कती कामेडी भरा रहा
शुभ रात्री और हां पहाडी वोलणा दिहनो भुलदे
जे भूलगे ता मै वहुत रौला पाउंगा 😝😜😅 ‪#‎अंकुशठाकुर‬

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